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डॉ ज़ाकिर हुसैन

सदी के महान शिक्षाविद डॉ ज़ाकिर हुसैन ने तभी समझ लिया था कि देश में कोई भी बदलाव केवल राजनीति के जरिए नहीं लाया जा सकता है, इसके लिए शिक्षा का रास्ता ही अपनाना होगा। उनका पूरा जीवन शिक्षा और धर्मनिरपेक्षता के लिए समर्पित रहा।


डॉ ज़ाकिर हुसैन का परिवार एक अफरीदी पठान परिवार  था जो उत्तर प्रदेश के क्वाइमगंज नामक छोटे से कस्बे में बसा हुआ था। 1897 में जब डॉ ज़ाकिर हुसैन का जन्म हुआ उनके दादा औरंगाबाद डेक्कन चले गए। ज़ाकिर हुसैन के पिता फैदा हुसैन पेशे से वकील थे।1905 में जब ज़ाकिर हुसैन 8 वर्ष के थे उनके पिता फैदा हुसैन का निधन हैदराबाद में हो गया। पिता के निधन के बाद उनकी माँ वापस उत्तर प्रदेश उनके पुश्तैनी घर में वापस आ गई।

 ज़ाकिर हुसैन ने इटावा में इस्लामिक हाई स्कूल में दाखिला लिया और त्रिपोली युद्ध में मारे गए मुसलमानों के परिवारों की मदद के लिए धन एकत्र करने में सहयोग करने लगे। डॉ ज़ाकिर हुसैन अपने स्कूली जीवन में अपने प्राध्यापक सैय्यद अल्ताफ हुसैन से बहुत प्रभावित थे।

1913 में  ज़ाकिर हुसैन ने अलीगढ़ में मोहम्मद एंग्लो – ओरिएंटल कॉलेज में दाखिला लिया। डॉ ज़ाकिर हुसैन वहाँ के छात्र संगठन के उपाध्यक्ष बन गए।1918 में डॉ ज़ाकिर हुसैन ने अपनी स्नातक की डिग्री समाप्त की और स्नातकोत्तर के साथ लॉं में प्रवेश लिया। समय 1920 का था, असहयोग आंदोलन जोरों पर था। महात्मा गाँधी 1920 में एम॰ ए॰ ओ॰ पहुचें। एम॰ ए॰ ओ॰ कॉलेज के छात्रों के एक समूह ने कॉलेज को मिल रही सरकारी मदद का विरोध किया, पर कॉलेज इसके लिए नहीं माना। इसके विरोध में छात्रो ने ज़ाकिर हुसैन के नेतृत्व में नेशनल कॉलेज की शुरुआत की। नेशनल कॉलेज के घोषणा-पत्र की प्रति को उन्होने गाँधी जी, डॉ अंसारी और अजमल खान को भी भेजा। यही नेशनल कॉलेज बाद में जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविध्यालय बना। इसका आरंभ अलीगढ़ की एक मस्जिद में 29अक्टूबर 1920 को किया गया। हाकिम अजमल खान इसके पहले चांसलर और मौलाना मोहम्मद अली इसके पहले कुलपति थे।इस विश्वविध्यालय की स्थापना के मूल में शिक्षा के केंद्र में इस्लामिक पहचान को कायम रखते हुए सदभावना पूर्ण राष्ट्रियता को बनाए रखना था।

जामिया में दो साल पढ़ाने के बाद 1922 में वह आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी चले गए। बर्लिन विश्वविध्यालय में तीन साल रहने के दौरान उन्होने अर्थशास्त्र में पी॰ एचडी॰ की।1926 में वह वापस भारत आ गए और जामिया के कुलपति हो गए। जामिया के कुलपति के रूप में 22 वर्ष तक काम करते हुए उन्होने जामिया को शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में स्थापित किया।  डॉ ज़ाकिर हुसैन और जामिया मिलिया इस्लामिया एक दूसरे के पर्याय बन गए। दूसरे शब्दों में जामिया की कहानी ही डॉ ज़ाकिर हुसैन की कहानी है। उनका उद्देश्य शिक्षा को आम जन तक पहुंचाना था, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय में। इस संस्थान को चलाने में डॉ  ज़ाकिर हुसैन अंग्रेज़ सरकार से कोई आर्थिक मदद नहीं लेना चाहते थे। इसलिए उन्होने अंजुमन-ए-तालीम-मिली (National Education Society) का गठन किया। इसका अध्यक्ष डॉ अंसारी और कोशाध्यक्ष सेठ जमना लाल बजाज को बनाया गया।डॉ ज़ाकिर हुसैन ने एक और संस्था हमदर्द-ए जामिया की स्थापना भी की।

गाँधी की बुनियादी शिक्षा और वर्धा विषविध्यालय के वैचारिक विस्तार में भी डॉ ज़ाकिर हुसैन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

शिक्षा के बारे में डॉ ज़ाकिर हुसैन के दर्शन को काशी विध्यापीठ के सम्बोधन से समझा जा सकता है जो उन्होने 14 अगस्त 1935 को दिया था। डॉ ज़ाकिर हुसैन ने कहा –“राष्ट्रीय शिक्षा में राष्ट्रीय धरोहर को संरक्षित करना चाहिए। मनुष्य के लिए याद का जो महत्व है वही महत्व समाज मे शिक्षा का है। जैसे सिर्फ एक याद के चले जाने से मनुष्य का जीवन उद्देश्य विहीन हो जाता है, इसी तरह से किसी देश का जीवन भी नष्ट हो जाता है यदि उसके अतीत को भुला दिया जाए। यदि भारत अपनी पहचान को मानव जाति के हित में उपयोग करना चाहता है तो उसे अपनी सांस्कृतिक पहचान को बचाए रखना होगा।

इस दर्शन को उन्होने जामिया मिलिया इस्लामिया मे आजमा कर देखा।  डॉ ज़ाकिर हुसैन के अनुसार शिक्षा को राष्ट्रीय उद्देश्य का केंद्र होना चाहिए। वह मानते थे कि अँग्रेजी शिक्षा देश के लिए अनुपयोगी और आत्माविहीन है। यही कारण था कि उन्होने जामिया में ‘कार्य आधारित शिक्षा पर धन दिया न कि पुस्तक आधारित शिक्षा पर’। जामिया शुरू से ही भारत कि आवश्यकता आधारित शिक्षा का केंद्र रहा।

डॉ ज़ाकिर हुसैन को आधुनिक भारत का ऐसा शिक्षाविद माना जाता है जिसने शिक्षा के विकास में देश के विकास के सपने देखे ।

 डॉ। ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु 3 मई 1969 को हो गयी।

For further details, read- Biography of Dr Zakir Hussain: The Great Educationist