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Resourcefulness

The agriculture fund is looking afterthe school’s requirements
The Government provides books, school uniforms, etc. to all students while the School Management Committee (SMC) provides the sports materials to the students who participate in sports. It alsoprovides musical instruments for the school band.

Committed teachers make a difference

The GovernmentPrimary School, Hotlu is located around 11kms away from Balotra. It has two teachers including Head Teacher Mr. Iqbal and approximately 60 students.


Schools that do things differently

The Elephant School, Sarpavaram Village:To begin with, we came to know that the school building here was constructed at a cost of Rs: 1 to 1.5 lakhs. It was interestingto learn that a child-friendly school with attractive features can be built within this budget.


The school even the neighbouring villages envy!

The condition of schools in tribal areas is known to all, but when someone recommends a school in a remote tribal area as a good school, it definitely increases one’s curiosity. But once you reach the school in the tribal village of Pandaripani (Raiyat), one can only agree in pleasant surprise!


Children in Care of School & Community

In the process of universalization of education, considering the community as one of the stakeholders has got its own history. Quantitative change has been taking place in the education sector for a long time. Occasiobally thee has been efforts by some communities to convert this quantitative change in to a qualitative one. Kabaadagere School is one among them. The community has maintained good rapport with the school continuously for 23 years contributing a lot toward the school’s progress.


Creative Teacher: Prashant Akkasaliga- A Case Study

The objective of the study is to understand how Prashant Akkasaliga developed as a change agent by involving in the formal and informal discussions in Teacher Learning Centre (TLC), and in the training programs by the department of education.


उच्च प्राथमिक विद्यालय रौंतल ;उत्तराखंड
उच्च प्राथमिक विद्यालय रौतल उत्तराखंड राज्य में  उत्तरकाशी जिले के चिन्यालीसौड़ विकास खंड में स्थित है । गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर धरासू बैंड से इस विद्यालय के लिए ग्रामीण सड़क योजना के तहत बनी रोड के जरिये पहुंचा जा सकता है । इस स्थान से विद्यालय कीदूरी लगभग 17 किलोमीटर है। 

राजकीय प्राथमिक विद्धयालयरू मातली
जनपद उत्तरकाशी के गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित मातली गाँव का प्राकृतिक सौंदर्य अत्यंत मनमोहक हैऔर यह गाँव अपने प्राकृतिक सौंदर्य और शैक्षिक संस्थानों की बहुलता दोनों के लिए प्रसिद्ध है ।इसकासका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पहाड़ के किसी एक गाँव में प्राथमिक स्तर के 9 संस्थान;8 प्राइवेट और 1 राजकीय प्राथमिक हैं।

चुनौतीपूर्ण है शिखर पर बने रहना
राजकीय प्राथमिक विद्यालय बसन्तनगरपुरोला विकासखण्ड में पुरोला कस्बे से लगभग 8 किमी दूरस्थित है । चारों ओर समतल खेती और उसके बाहर स्थित सुन्दर चोटियां। बसंतनगर गांव में अधिकांश परिवार टिहरी गढ़वाल के प्रतापनगर क्षेत्र से आकर बसे हैं।

नवाचार एवं बालप्रिय शिक्षण का केंद्र- डोकरीखेड़ा स्कूल
सूरज (कक्षा-8) और राजेश (कक्षा-6) की तरह कई बच्चे अक्सर प्रार्थना सभा के बाद ही स्कूल पंहुचते है एवं स्कूल शिक्षिका उसे कुछ नही कहती क्योंकि आराधना पटेल एवं उनकी शिक्षक साथियों को ऐसे बच्चों के परिवार की परिस्थिति के बारे में पता है। सूरज और राजेश परिवार के खेती- बाड़ी के काम में हाथ बंटांते हैं और काम करके लौटने में अक्सर देरी हो जाती है। वंचित समुदाय की पक्षधर आराधना बताती है कि उनके स्कूल में दर्ज 95 प्रतिशत बच्चे आदिवासी समुदाय के हैं । और यह इस समुदाय की पहलों पीढ़ी है जो स्कूल आई है(प्रथम पीढ़ी के लर्नर हैं)। आदिवासी समुदाय के बच्चों को शिक्षा से जोड़े रखने के लिए सुरज व राजेश जैसे बच्चों को ऐसी सहूलियत देना ही पड़ेगा भले ही मुख्यधारा में इसे‘ठीक’ नहीं माना जाता हो।

प्राइवेट स्कूल के 30 बच्चों ने शासकीय स्कूल में नाम लिखवाये !
छत्तीसगढ़ में एक स्कूल ऐसा भी है जहां गाँव के लोग स्कूल में आते-जाते हैं, बच्चों की पढाई के बारे में शिक्षकों से बात करते हैं, उनके बच्चे किन विषयों को नहीं समझ पा रहें हैं शिक्षकों को बताते हैं, बात इतनी ही नहीं है, ग्रामवासियों ने अपने बच्चों का नाम प्राइवेट स्कूलों से कटवा कर 30 बच्चों को इसी विद्यालय में भर्ती करवाया है।
 

स्कूल की कायापलट
‘मोरवन’ मतलब मोरों का वन, ऐसा वन जहॉ मोर रह सकेंया रहते हों । जी हॉ, चित्तैडगढ जिले की डूडंला पंचायत में मोरवन गॉव के लोगों का ऐसा ही कुछ मानना है अपने गॉव के बारे में। गॉव के प्राथमिक विद्यालय को देखकर यकीन हो जाता है कि इस गॉव का यही नाम होना चाहिए।

पर्याप्त स्टाफ होने पर बेहतर बनता है - एक स्कूल

विद्यालय में 6 कमरे हैं। वे हमेशा साफ-सुथरे रहते हैं। टॉयलैट्स भी साफ रहते हैं। रसोई घर भी साफ रहता है। विद्यालय की समस्त सामग्रियाँ निश्चित स्थान पर रहती हैं। बच्चों से जुड़ी सामग्रियाँ उनकी पहुँच में होती हैं। उनको उपयोग में भी लिया जाता है और वापस वहीं रख दिया जाता है। पादुकाएँ भी आपको बिखरी हुई नजर नहीं आएँगी। शिक्षण में गतिविधियों का अधिकतम प्रयोग किया जाता है।

हमारे स्कूल का लक्ष्यः बच्चों का सर्वांगीण विकास

शिक्षिकाआराधनापटेलकेबारेमेंबातकरनाऐसे समय में ज़्यादा उपादेय हो जाता है जबकि शिक्षा तंत्र बहुत सारे सवालों से घिरा हुआ है,हर तरफ़ से उंगलियाँ उठ रही हैं और इसका केन्द्र यानी स्कूल का मुख्य कार्यकर्त्ता ही इसकी ख़ामियों,संसाधनों की कमियों औरछात्रों व पालकों के बारे में उपेक्षा दर्शाता हुआ नज़र आता हो।


तोअबतुममास्टरबनोगे?

उत्तराखण्ड में खटीमा के करीब एक गांवहैभड़भुड़िया। यह गांवइनदिनों यहां के स्कूलमेंहोरहेप्रयासों के लिए जानाजाताहै।प्रकाशपांडे उन युवाशिक्षकोंमेंसेहैंजिनसेभविष्य के लिए उम्मीदरोशनहोतीहै।प्रकाश ने प्राइमरीशिक्षकबननेकासपनाबचपनसेआंखोंमेंपालाहो ऐसाभीनहींहै।लेकिनजबवेइसरास्तेपरचलेतोउन्हें एहसासहुआकिजिन्दगी के इसरंगसेतो वो अबतकअपरिचितहीथे।





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