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पाठशाला भीतर और बाहर का द ूसरा अंक आपके सामने है। हमारे लि ए सबसे महत्त्वप ूर्ण प हलू यह है कि इस अंक के लि ए और कुछ नए लेखक मि ले। इनमें से बहुत से नए शोधकर्ता हैं और कई शिक्ष क भी हैं। हि न्दी व अन्य भारतीय भाषाओं में इस त रह के प्रयास न सिर्फ़ नए अनुभवों व उनके वि श्ले षण को सामने लाते हैं वरन् स् कूलों में व अन्य स्थलों प र कार्य करने वालों को अपने कार्य प र मनन करने व उस प र अन्य लोगों की टिप्प णी व प्रतिक्रिया जानने का मंच भी प्रदान करते हैं। भारतीय भाषाओं में लि ख प ाने की स्वा भावि कता के कारण न सिर्फ़ लेखक लि खने के लि ए, अपने अनुभव, वि चार, वि श्ले षण व समझ साझा करने के लि ए अपने आपको प्रो त्साहित कर प ाते हैं बल्कि उनके लि ए लि ख प ाना भी शायद सहज हो जाता है। शि क्षा व समाज का रि श्ता बहुत स्थि र भी है और परि वर्त शील भी। इस स्थि रता व परि वर्त न को खँगालना व उन प र नए ढंग से वि मर्श व मनन शुरू करना भी प ाठशाला भीतर और बाहर का एक मक़सद है। हमें इस बात की बहुत खुशी है कि बहुत से लेख आए हैं और आ रहे हैं। फ िर भी आप सब की ओर से और लेख आते रहें यह पत् रिका की बेहतरी के लि ए बहुत महत्त्वप ूर्ण है। इस अंक में जो लेख हैं उनका संक्षिप्त परिचय हम यहाँ द े रहे हैं, जिससे आप को इस अंक के कलेवर की झलक मि ल प ाए।

पाठशाला भीतर और बाहर (Paathshaala Bhitar Aur Bahar)

february, 2019

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सी एन सुब्रह्मण्यम्
मुकेश मालवीय
अक्षय कुमार दीक्षित
फूलचन्द्र जैन से गुरबचन सिंह की बातचीत
सुकन्या बोस
प्रियन्तो घोष और अरविंद सरदाना