आनंद ने पढ़ाने को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक जीवंत अनुभव बना दिया। कभी वह भालू नाचने वाले का भेष धरकर बच्चों को चौंका देते, तो कभी उनकी ही भाषा सीखकर उनसे दिल से जुड़ जाते। पढ़ाई उनके लिए खेल भी थी और सीख भी। बीस सालों से चल रही आनंद की यह यात्रा हमें सिखाती है कि सच्चा शिक्षक वही है, जो बच्चों के दिल तक पहुँचे और उन्हें जीवनभर याद रहने वाला सीखने का अनुभव दे।