नक्षत्रगळु । भाग 17 । आनंद चिन्नप्पा, हिडगळी तांडा, विजयपुरा। उमाशंकर पिरियोडी

आनंद ने पढ़ाने को सिर्फ़ किताबों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे एक जीवंत अनुभव बना दिया। कभी वह भालू नाचने वाले का भेष धरकर बच्चों को चौंका देते, तो कभी उनकी ही भाषा सीखकर उनसे दिल से जुड़ जाते। पढ़ाई उनके लिए खेल भी थी और सीख भी। बीस सालों से चल रही आनंद की यह यात्रा हमें सिखाती है कि सच्चा शिक्षक वही है, जो बच्चों के दिल तक पहुँचे और उन्हें जीवनभर याद रहने वाला सीखने का अनुभव दे।

© 2026 अजीम प्रेमजी फाउंडेशन. सर्वाधिकार सुरक्षित।
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