यह अब सिर्फ़ दिन भर बच्चों को संभालने की जगह ही नहीं, बल्कि पोषण, आजीविका और बच्चों की शुरुआती मानसिक-बौद्धिक व शारीरिक विकास को सही दिशा देने का माध्यम बन रहे हैं।

बच्चे यहाँ प्यार और पोषणयुक्त आहार पाते हैं एवं और मज़ेदार गतिविधियों में हिस्सा लेते हैं।
लइका घर बच्चों के विकास का लगातार जाँच करते हैं और दर्ज करते हैं। इन सबके साथ ही शिशु घर स्थानीय स्तर पर बाल-पोषण और बच्चों की शुरुआती देखभाल की इससे जुड़े माता-पिता व अभिभावकों को बेहतर ढंग से समझा व लागू कर रहे हैं। शिशु घर इसकी सैद्धांतिक ज़रूरतों और स्थानीय स्थितियों के साथ तालमेल बैठाते हुए लगातार काम कर रहे हैं। वे युवाओं को सामाजिक क्षेत्र में आने व काम करने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं।
अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन की शिशु घर पहल छत्तीसगढ़, बिहार, झारखण्ड और ओडिशा जैसे राज्यों में अपने 25 से ज़्यादा पार्टनर संगठनों के साथ मिलकर काम कर रही है। इन शिशु घरों में बच्चों की देखभाल और उन्हें संभालने का कार्य केअर-गिवर्स करते हैं। इन केअर-गिवर्स के कामों को दिशा-निर्देश करने का काम सुपरवाइज़र द्वारा किया जाता है। ऐसे ही सुपरवाइज़र के रूप में सीमा काम करती हैं। सीमा प्रजापति ने अंबिकापुर होली क्रॉस महिला महाविद्यालय से मास्टर ऑफ़ सोशल वर्क (MSW) पूरा किया और पहली नौकरी शुरु की। आज वह दंडगाँव सेक्टर में काम कर रही हैं और सात लइका घरों की देखरेख कर रही हैं। सीमा बताती हैं, “मुझे शुरू से ही समाज सेवा के क्षेत्र में काम करने की इच्छा थी। मैं कुछ नया सीखना चाहती थी। चौपाल संस्था ने मुझे यह अवसर दिया। मुझे बिलासपुर जाकर जन स्वास्थ्य संस्थान (JSS) में प्रशिक्षण लेने के लिए कहा गया।”

सुपरवाइज़र सीमा प्रजापति
समाज सेवा के क्षेत्र में आने के लिए प्रेरणा देने वाले कारण क्या रहे होंगे? सीमा ने अपने आस-पास कई तरह की सामाजिक समस्याएँ देखीं और उन्हें बदलने का विचार ने उन्हें जीवन को सार्थक बनाने वाले सामाजिक काम करने की प्रेरणा दी। हो सकता उन्होंने साय परिवार जैसे कई उदाहरण अपने आस-पास देखे हों। साय परिवार छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ विकासखंड के बोरो गाँव में रहता है। इस सुदूर आदिवासी गाँव में के कंवर, मुंडा और बैगा जैसे समुदाय अपनी जड़ें जंगल और खेतिहर मज़दूरी से जोड़ते हैं। गाँव में सामाजिक सुरक्षा योजनाएँ बड़ी मुश्किल से पहुँचती हैं। ऐसी ही कई वजहों से वंचित वर्ग कुपोषण से जूझ रहा है, जिसके साय परिवार जैसे कई परिवारों के बच्चे शिकार हो रहे हैं। साय परिवार का 7 साल का यूरेश इतना कमजोर है कि वह दिनभर लेटा रहता है। 4 साल का नरेश भी कुपोषित है। सबसे छोटी बेटी अलिशा सिर्फ़ 7 महीनों की है। परिवार का गुज़ारा मज़दूरी और जंगल के संसाधनों के सहारे होता है।

बोरो गाँव का साय परिवार के बच्चे कुपोषित हैं जिन्हें क्रेच लाना एक बड़ी चुनौती है।
गाँव में ‘लइका घर’ की शुरुआत होने के बावजूद, साय परिवार अपने बच्चों को वहाँ भेजना नहीं चाहता। जब हमने पूछा कि वे बच्चों को लइका घर क्यों नहीं भेजते, तो सन कंवर ने कहा, “बच्चे वहाँ अकेले नहीं रह पाते, रोते हैं और मुझे घर के काम के साथ साथ 2 बैलों को चराने जाना भी होता है।”
शिशु घर में काम करने वाले सीमा जैसे कार्यकर्ताओं को सिर्फ़ कुपोषण से ही नहीं लड़ना होता है, उन्हें सामाजिक मान्यताओं से जूझना और परिवार के लोगों को भी कई चीज़ें बार-बार समझानी पड़ती हैं। इस तरह के परिवारों से शिशु घर कार्यकर्ताओं को संवाद और परामर्श करना होता है। उनमें शिशु घर के प्रति विश्वास और अपनापन निर्माण करना होता है। इन जैसी वजहों के कारण सामाजिक क्षेत्र में काम करने के लिए प्रशिक्षण ज़रूरी होता है। प्रशिक्षण के बारे में सीमा बताती हैं, “प्रशिक्षण के बाद हमें तुरंत फील्ड में भेज दिया गया। गाँवों का सर्वेक्षण कर यह तय करना था कि लइका घर कहाँ स्थापित किए जाएँ। यह मेरे लिए भी नया अनुभव था, क्योंकि इससे पहले मैंने गाँवों में इतना समय नहीं बिताया था। लेकिन मैंने प्रयास किया। मेरे परिवार ने भी मेरा हौसला बढ़ाया। मेरी बातचीत करने की शैली लोगों से जल्दी जुड़ने में मददगार साबित हुई।”
लइका घर जैसी पहलें बदलाव की दिशा में अहम कदम हैं, लेकिन इन्हें सफल बनाने के लिए स्थानीय परिस्थितियों और समुदाय की जरूरतों को ध्यान में रखना होगा। इसी तरह की स्थितियों का सामना सीमा और उनकी टीम को भी करना पड़ा। सीमा और उनकी टीम ने धीरे-धीरे समुदाय को जागरूक किया।
“हम बच्चों को समय के अनुसार दिन में चार बार भोजन देते हैं और उनके साथ विभिन्न गतिविधियाँ करवाते हैं, जिससे वे ख़ुश रहते हैं। इसके अलावा, हम उनका वज़न और ऊँचाई नापते हैं और उसे दर्ज करते हैं। दीदियों की उनके काम में मदद करते हैं और उन्हें बच्चों की देखभाल के सही तरीके सिखाते हैं।”
– सीमा
जब लइका घर शुरू हुआ तो अभिभावकों ने अपने बच्चों को वहाँ भेजना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे, जब उन्हें इसके फ़ायदे दिखने लगे, तो उन्होंने गाँव में अन्य लोगों को भी इसके बारे में बताना शुरू कर दिया। सीमा बताती हैं, “हम बच्चों को समय के अनुसार दिन में चार बार भोजन देते हैं और उनके साथ विभिन्न गतिविधियाँ करवाते हैं, जिससे वे ख़ुश रहते हैं। इसके अलावा, हम उनका वज़न और ऊँचाई नापते हैं और उसे दर्ज करते हैं। दीदियों की उनके काम में मदद करते हैं और उन्हें बच्चों की देखभाल के सही तरीके सिखाते हैं।”
शिशु घर ने लोगों की ज़िंदगी को कई मायनों में आसान बनाया है। हमें यहाँ ऐसे बड़े बदलाव का एक मामला छत्तीसगढ़ के सरगुजा ज़िले के सलबा गाँव में हमने देखा। यहाँ 29 वर्षीय ललिता सिंह अपने ढाई साल के बेटे ऋषिकेश को छोड़ने आई थीं।
उन्होंने हमें बताया “जब से मेरा बेटा यहाँ आने लगा है, वह बहुत ख़ुश है। यहाँ बच्चे बहुत कुछ सीखते हैं और जब वे यहाँ होते हैं, तो हम भी घर के काम निपटा सकते हैं, या ज़रूरत पड़ने पर बाहर भी जा सकते हैं। जैसे अभी धान रोपाई का समय है, तो हम आराम से खेतों में काम कर सकते हैं। ‘लइका घर’ की वजह से हमें बहुत सहूलियत हो गई है।”

लइकाघर खुलने से ललिता अब घरेलू काम के साथ साथ मजदूरी व जंगल भी जा पाती हैं।
इस लइका घर में बच्चों की देखभाल के लिए दो महिला कर्मी, मीना सिंह और नीलम सिंह, पूरी समर्पण के साथ काम करती हैं। मीना बताती हैं, “हम सुबह 8 बजे यहाँ आते हैं, साफ़-सफ़ाई के बाद बच्चों का स्वागत करते हैं। उनके लिए सत्तू का लड्डू, अंडा, खिचड़ी और हलवा जैसी पौष्टिक चीज़ें तैयार करते हैं। साथ ही, उनकी गतिविधियों का भी ध्यान रखते हैं।”
अब अभिभावक भी जागरूक हो रहे हैं। पहले जब उन्हें बुलाया जाता था, तो वे टालमटोल करते थे, लेकिन अब वे ख़ुद ही लइका घर में आने लगे हैं।
कई जगहों पर सचिव और सरपंच को भी इस प्रक्रिया में जोड़ा गया, जिससे लइका घर को और अधिक समर्थन मिलने लगा। सीमा स्वीकार करती हैं कि शुरू में उन्हें यह काम अच्छा नहीं लगता था।
“पहले मुझे बच्चों के साथ काम करने में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं थी, लेकिन जब मैंने इसे करीब से समझा और अनुभव किया, तो यह काम मुझे अच्छा लगने लगा। अब मुझे बच्चों के साथ समय बिताना और उनके विकास में योगदान देना बेहद सुखद लगता है।”
“पहले मुझे गाँवों में काम करने को लेकर संकोच होता था, लेकिन अब मुझे कोई परेशानी नहीं होती। मैं लोगों से घुल-मिल गई हूँ और यह काम अब मेरा पसंदीदा बन चुका है।”
– सीमा
अब सीमा पूरी तरह से आत्मविश्वास से भर चुकी हैं। “पहले मुझे गाँवों में काम करने को लेकर संकोच होता था, लेकिन अब मुझे कोई परेशानी नहीं होती। मैं लोगों से घुल-मिल गई हूँ और यह काम अब मेरा पसंदीदा बन चुका है।” लइका घर से न सिर्फ़ बच्चों और उनके माता-पिता का जीवन बदला है, बल्कि सुपरवाइज़र सीमा जैसी युवतियों को भी आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया है।
यह कहानी उन सभी के लिए प्रेरणादायक है, जो समाज सेवा के क्षेत्र में कुछ करना चाहते हैं। शिशु घर बच्चों के लिए पोषण व ख़ुशियों की वजह बना है, तो माता-पिता के लिए विश्वास व अपनेपन की जगह बना है।
लेखकों के बारे में
पुरूषोत्तम ठाकुर, रिसोर्स पर्सन, कम्युनिकेशन फंक्शन, अज़ीम प्रेमजी फ़ाउण्डेशन
मोबिन जहोरोद्दीन, सहायक प्रोफेसर, अनुवाद पहल, अज़ीम प्रेमजी विश्वविद्यालय
चित्र: पुरुषोत्तम ठाकुर
