फ्लाई-ओवर और पुलों के नीचे सोते लोग, फ़ुटपाथ पर झुंड में बैठे परिवार, ट्रैफिक सिग्नलों, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर भीख मांगते असहाय और बूढ़े लोग; ये सब भारत के मेट्रो शहरों का बेहद आम दृश्य है। ये शहरी बेघर हमारे आस पास ही हैं, लेकिन तेजी से फ़ैलते शहरों में हम उनकी मौजूदगी को तवज्जो नहीं देते। उनका जीवन असमानता, वंचना और उनके तिरस्कार की कहानियाँ है।

बेंगलुरु के एक बस टर्मिनल पर सुस्ताती एक बेघर महिला
बेंगलुरु भी इस शहरी बेघरपन से वाकिफ है। लगभग एक दशक से गैर लाभकारी संस्थाएं म्यूनिसपिल संस्थाओं के साथ मिलकर सड़कों पर रहने वाले हजारों लोगों को आसरा और देखभाल उपलब्ध करा रही हैं।
2024 का एक शोध बताता है कि बेंगलुरु में लगभग 10,000 बेघर और बेआसरा लोग हैं, और इनमें से लगभग 80% पुरुष हैं। इसमें से लगभाग 85% लोग शहर भर में फैले 50 सबसे व्यस्त जगहों पर हैं। इनमें से बहुत से लोग असंगठित सेक्टर में कचरा बीनना, समान ढुलाई, होटलों में काम या भीख मांगने जैसे काम करते हैं और ये सब काम उन्हें किसी भी तरह की सुरक्षा या स्थायित्व नहीं देते।
नशे की लत और बेघरबारी: एक पुराना दुष्चक्र
सुबह के 6 बजकर 30 मिनट हुए हैं बेंगलुरु के सेंट्रल स्क्वाएर पुलिस स्टेशन, जहां अक्सर बहुत चहल पहल रहती है, इस समय बहुत शांत है। थोड़ी ही दूर पर एक पार्क में बहुत से लोग अलग-अलग बेंच पर हैं। कुछ और लोग दुकानों के सामने इधर उधर बिखरे हुए हैं। ये बेंगलुरु के वे नागरिक हैं, जिनके पास अपना कहने को कोई घर नहीं है।
56 साल के नाना भाई कोलागाँव (जिला जलगाँव, महाराष्ट्र) से हैं। उन्होंने कुछ साल पहले अपनी बीवी से अनबन के बाद घर छोड़ दिया था। “वो मेरी शराब की लत की वजह से रोज़ झगड़ा करती” बेंगलोर में घर खोजना, काम खोजने से ज्यादा मुश्किल है। नाना भाई मजदूरी करते हैं और रोज़ 600 रुपये कमाते हैं, लेकिन वो ज्यादार पैसा शराब पर उड़ा देते हैं।

नाना भाई एक दिहाड़ी कामगार हैं।
नानाभाई का अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है। उनके जैसे अनेक बेघरों की तरह उनकी भी कुल जमा संपत्ति एक पिट्ठू बैग है, जिसमें उनकी सारी रोज़मर्रा की जरूरतों की चीज़ें रहती हैं।
अकबर की कहानी: एक मकसद और वह
47 वर्षीय अकबर अली खान की कहानी जैसा 180 डिग्री वाला बदलाव बहुत कम कहानियों में ही देखने को मिलता है। ये लगातार देखभाल से ही संभव हो पाता है। बहुत सालों तक अकबर फुटपाथ पर ही सोए। वह केवल तीसरी जमात तक ही पढ़ पाए थे। उनके पास काम के लिए बहुत ज़्यादा विकल्प नहीं थे और छोटी- मोटी चोरी ही बचती थी, जिसको ” दुख के साथ याद करते हैं।” वे बताते है ” लेकिन कोई शर्म की बात नहीं। मैंने बहुत साल गँवाए, लेकिन मेरे कहानी वहाँ खत्म नहीं होती”
उसके जीवन में थोड़ा स्थायित्व तब आया जब उसकी सास ने उससे अपनत्व जताया, उसने अकबर का सम्मान किया जिसका अनुभव उसे कम ही था। उसने शादी की और जयनगर में एक छोटा सा घर बनाया और एक नई शुरुआत की। लेकिन चीज़ें उसके हिसाब से नहीं चली और अकबर एक बार फिर बेघर हो गया।
उसका असली बदलाव तब तब शुरू हुआ जब वह एम सी आर सी (मेडिकल केयर एंड रिकवरी सेंटर) में आया। वहाँ उसकी जो देखभाल हुई, उसने कुछ ऐसा जगा दिया जो बरसों से उसके मन में सोया पड़ा था। उसने वहाँ छोटी-मोटी मदद, जैसे चादरें तह करना, पानी लाना, दुखी मरीजों के साथ बैठना शुरू किया। ये सब देखने में रोज़मर्रा के साधारण से काम थे, लेकिन अकबर के लिए ये अपने खुद के महत्त्व को पहचानने के कदम थे।
आज अकबर एम सी आर सी में नाइट इंचार्ज है। और 16000 रुपये कमाता है और उसमें से अनुशासन से 11000 रुपये की बचत करता है। उसका सपना है कि वह एक बार फिर एक घर बनाए। लेकिन उससे भी ज्यादा वह चाहता है कि वह संकट में पड़े लोगों को महसूस करा सकें कि कोई उनके दुख सुनने वाला भी है। उसकी हर नाइट ड्यूटी उसके बीते समय की पीड़ा को कम करती है।

प्रवासी मजदूरों के लिए रूटीन स्वास्थ्य कैंप में बलद प्रेशर चेक करते हुए।
झूलन की घर वापसी की राह
21 मई 2025 को मैजेस्टिक स्टेशन पर रेलवे पुलिस ने प्लेटफार्म पर अकेली बैठी महिला को देखा। कुछ गुनगुनाती, कुछ खुद से बुदबुदाती। जब उनकी मदद के लिए लोग उनके पास पहुंचे तो वह डर गईं और उन्होंने मदद लेने से इंकार कर दिया। बहुत धीरज और शालीन बातचीत के बाद सामाजिक कार्यकर्ता उनका विश्वास हासिल कर पाए।
ये बेघर महिला झूलन थीं। पहले पति ने बच्चा न होने के कारण झूलन को छोड़ दिया और बाद में उनकी दूसरी शादी कर दी गई। हताश होकर उन्होंने घर छोड़ दिया। महीनों घूमते-भटकते आखिरकार वे बेंगलुरु पहुँच गईं।
इमरजेंसी केयर एण्ड रिकवरी सेंटर में उनको तुरंत ही मदद मिली। अगले दिन कोलकाता पुलिस ने सूचना दी कि झूलन के परिवार वालों ने कुछ महीनों पहले गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कारवाई थी। एक वीडियो कॉल के जरिये विपत्ति में पड़ी इस महिला को उनके माता-पिता और बहन से मिलवाया गया। ईसीआरसी में एक सप्ताह सेहतयाब होने के बाद, 9 जून को टीम ने झूलन की वापसी बाँकुरा, पश्चिम बंगाल सुनिश्चित की। जब महीनों की अनिश्चितता और पीड़ा झेलने के बाद झूलन को उसके परिवार ने अपनाया, तो वह एक भावुक करने वाला क्षण था।
ख्याल रखने वाली व्यवस्था - नम्मा कुटुम्बा
नाना भाई, अकबर या झूलन जैसे लोगों के लिए नम्मा कुटुम्बा (हमारा घर) दरअसल वो पहली जगह है, जहाँ उन्हें पहली बार सुकून और सहयोग मिला। नम्मा कुटुम्बा प्रोजेक्ट एक उम्मीद की किरण है जो बेघर लोगों को गरिमा, सुरक्षा और व्यापक देखभाल उपलब्ध कराने के लिए 2022 में शुरू किया गया था।
ये प्रोजेक्ट कुछ गैर- सरकारी संस्थाओं- प्रोजेक्ट स्माइल ट्रस्ट, आल्दमार फाउंडेशन और दया रिहेबिलिटेशन ट्रस्ट (थानल) का साझा प्रयास है। ये कार्यक्रम रास्तों पर सर्वे कर वंचित लोगों की पहचान करता है और उनको मेडिकल कैंप, दिन-रात के शेल्टर्स उपलब्ध करा कर और पूरी तरह से इस काम को समर्पित हेल्पलाइन के माध्यम से उनकी मदद करता है।
नम्मा कुटुम्बा संपर्क के माध्यम से बेघर लोगों के जीवन में हर स्तर पर मदद करता है। लोगों को बचाने की मुहिम से लेकर स्वास्थ्य, उनके बारे में जानकारी इकट्ठा करने में मदद, काउन्सेलिंग, पुनर्वास, और परिवार से मिलाने तक, हर स्तर पर मदद करता है।

इंस्पेक्टर सविता, बसावनगुडी पुलिस स्टेशन, बेंगलुरु
बासवनगुडी पुलिस स्टेशन बेंगलुरु की इस्पेक्टर सविता बताती हैं “मुझे लोगों को सड़क पर छोड़ देना अच्छा नहीं लगता। अपने पुलिस स्टेशन से उन बेघरों के सम्मान को बचाने की हर संभव कोशिश करती हूँ’ नम्मा कुटुम्बा टीम इसमें हमारी बहुत मदद करती है। यहाँ तक कि मैं अगर रात 11 बजे भी फोन करूँ, तो भी वे तुरंत हमारी बात पर अमल करते हैं और बचाव की मुहिम से लेकर उनके पुनर्वास और परिवार से मिलवाने तक, हर स्तर पर हमारी मदद करते हैं।”
बेघरों की घुमंतू प्रवृत्ति के बावजूद, नम्मा कुटुम्बा ने अपने प्रायस लगातार जारी रखे हैं। केवल सड़कों पर लोगों से मिलते रहने की मुहिम के जरिये टीम 450 से ज्यादा लोगों से संपर्क में है, हर केस में संयम, संवेदनशीलता और सम्मान के साथ पहुँचती है। अपनी हर मुहिम में ये प्रोजेक्ट दिखाता है कि कैसे कोई शहर को बेघरों की समस्याओं को करुणा और सेवभाव से बरता जा सकता है।
