उन्होंने और उनकी पत्नी ने एक बाग लगाया। केवल खेती के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में निवेश के लिए।

महंगू कुम्हार मुस्कुराते हुए याद करते हैं कि “जब मैंने उन्हें बताया कि मैं अपनी ज़मीन में एक बाग लगाना चाहता हूँ तो हर कोई मुझे ऊपर से नीचे तक हैरानी से देखने लगा”
अस्सी की उम्र में वे बिल्कुल भी वैसे नहीं थे जैसी लोगों की इस काम को करने के लिए अपेक्षा थी।
वो 2024 का साल था। झारखंड के गुमला जिले के सकतार गाँव में अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन की लाइवलीहुड टीम के साथ छोटे और गरीब किसानों की एक मीटिंग चल रही थी। इस मीटिंग में महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून (मनरेगा) के तहत बाग लगाने पर बातचीत हो रही थी। ये एक ऐसी योजना थी, जिससे टिकाऊ आजीविका और लंबे समय तक आय सुनिश्चित हो सकती थी।
बहुत से गाँव वालों ने सुना। कुछ आगे आए।
महंगू उन कुछ में से एक थे।
“आपकी उम्र हो गई है। पेड़ लगाने और उनकी देखभाल करना काफी मेहनत का काम है, इस उम्र में आप कैसे कर पाएंगे?” ये पहला सवाल था जो महंगू के सामने आया था। उसकी पत्नी भुतनी देवी जो उस समय 73 वर्ष की थीं, एक मौन संबल सी उनके साथ खड़ी थीं।
उनकी उम्र के बाकी लोग इस उम्र में आराम की सोचते थे। लेकिन इस जोड़े के लिए बाग लगाना महज खेती नहीं था, बल्कि अपने जीवन जो दोबारा गढ़ना और भविष्य को सुरक्षित करना था।
महंगू ने लाइवलीहुड टीम के लोगों से काफी आत्मविश्वास के साथ बातचीत की। “अगर हमारे पास ज़मीन है, तो उसका इस्तेमाल क्यों न करें?” उन्होंने पूछा।

महंगू की लोहे जैसी पुख्ता दृढ़ता ने टीम के लोगों को दुविधा में डाल दिया। फाउंडेशन की सदस्य हंसिका कुमारी ने बाद में बताया- “हम मानकर चल रहे थे कि केवल युवा लोग ही बाग लगाने और उसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी लेने के लिए आगे आएंगे- गड्ढे खोदकर पेड़ लगाना, फिर उनकी लगातार देखभाल करना, फल लाने पर उनकी व्यवस्था करना और फलों को बाजार तक पहुंचाना, ये सब मेहनत के काम हैं। लेकिन महंगू दादा ने हमारी समझ को गलत साबित कर दिया।”
एक ही साल में महंगू की कड़ी मेहनत और फाउंडेशन के सहयोग और मार्गदर्शन ने अच्छे परिणाम दिये। इस अस्सी वर्षीय व्यक्ति ने टीम के साथ पहला आम खाया।
मई 2020 में लागू की गई झारखंड सरकार की बिरसा हरित ग्राम योजना के तहत गुमला जिले के तीन विकास खंडों में महंगू और 400 अन्य लोगों ने आम की बाग लगाए। इस योजना का पहला उद्देश्य बंजर और परती ज़मीन पर फलों के बाग लगाकर ग्रामीण आय बढ़ाना और राज्य की धरती का हरित हिस्सा बढ़ाना था।
पारंपरिक बर्तन बनाने से टिकाऊ खेती तक
महंगू कुम्हार समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। शादी के बाद वे अपनी पत्नी के साथ छत्तीसगढ़ में जशपुर जिले के धनतोली गाँव में आ गए थे। उन्होंने आमदनी के मिट्टी के बर्तन बनाने का काम शुरू किया। लोग पैसे के बजाय उन्हें चीज़ें भी दे देते थे।
“उस समय यही व्यवस्था थी। भुतनी देवी बताती हैं ” लोग उस समय बर्तनों के बदले धान दे दिया करते थे। जीवन आसान था और हम काम चला लेते थे।”
उम्र के साथ बर्तन बनाने का काम मुश्किल होता गया। कमजोर आँखों और शारीरिक थकान की वजह से काम करना मुश्किल हो गया। दंपति ने पुश्तैनी गाँव सकतार वापस आने का निर्णय किया, जहां महंगू के पास तीन एकड़ पुश्तैनी ज़मीन थी।
दोनों ने मिलकर धान और सब्जियाँ उगाना शुरू किया। लेकिन उनकी ज़िंदगी कई त्रासदियों से गुजरी। उनके दो पोते अलग अलग दुर्घटनाओं का शिकार हुए। एक की मृत्यु बिजली गिरने से और दूसरे की आपसी पारिवारिक रंजिश के कारण हुई। उनका परपोता परमेश्वर, बेसहारा हो गया था।

इस वक्त इस दंपति ने तय किया कि वे अपने जीवन के बचे हुये समय में कुछ अर्थपूर्ण करेंगे। महंगू बताते हैं-
“हमें नहीं पता कि हमारे पास कितना समय बचा है, लेकिन अब हम जो कुछ भी कर रहे हैं, अपने परपोते के लिए कर रहे हैं।”
ये बाग वही प्रतिज्ञा है।
एक दीर्घ कालिक आजीविका की निर्मिति
फाउंडेशन की लाइवली हुड टीम के मार्गदर्शन और मनरेगा के सहयोग से महंगू ने अपनी ज़मीन को आम के बाग में बदल दिया। उन्होंने गड्ढे खोदकर पेड़ लगाए, नियमित रूप से पानी दिया और बाड़ लगाई।
आज उनकी ज़मीन पर आम के पौधों की लंबी कतार दिखती है। बीच बीच में सब्जियों की खेती भी होती है, जिससे उन्हें फौरी तौर पर भोजन और पूरक आय भी मिलती है। ये अच्छा है कि उनका लगाया एक भी पौधा मरा नहीं, जो दिखाता है कि उनकी देखभाल बेहद अच्छी तरह से की गई है।
हमें महंगू अपनी ज़मीन पर अपनी कुदाल के साथ मिले। दिसंबर की नर्म धूप में वे पेड़ों के आसपास की मिट्टी को ढीला कर रहे थे। भुतनी देवी और छुटकू परमेश्वर खर-पतवार हटाने में उनकी मदद कर रहे थे।

उनकी आजीविका साधारण लेकिन स्थायी है। उनके पास एक छोटा सा किचन गार्डेन भी है, जिसमें वे अपनी रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए चीज़ें उगाते हैं, एक दुधारू गाय है, और दो बैल हैं, जिससे महंगू खेतों की जुताई करते हैं। उनका एक कमरे का कच्चा मकान ही उनका रसोईघर, सोने का कमरा और स्टोरेज है।
इस बाग ने आय से ज्यादा ज़रूरी चीज़ उनके जीवन में जोड़ी है। वह है सुरक्षा। आम के पेड़ों पर दसियों साल आम लगते रहेंगे। महंगू और भुतनी के मरने के बाद भी ये बाग परमेश्वर की आय के लिए उत्पादन करता रहेगा।
समुदाय के लिए प्रेरणा
“महंगू जी की सफलता ने गाँव के अनेक लोगों को बाग लगाने के लिए प्रेरित किया है।” लाइवलीहुड टीम की सदस्य बताती हैं “अनेक युवा किसान उनके समर्पण से प्रोत्साहित हैं।”
158 परिवारों वाले गाँव में, जहां नियमित आय लगभग अनिश्चित है और पलायन एक आम बात, वहाँ बाग लगाने का ख्याल एक स्थायित्त्व की छवि देता है। ये दर्शाता है कि कैसे सरकारी योजना, सामुदायिक सहयोग और व्यक्तिगत दृढ़ता के साथ मिलती है, तो आजीविका के छोटे प्रयास भी बड़ी पूंजी बन जाते हैं।
जब हम चलने ही वाले थे… महंगू बोले ” फिर आइएगा, जब बाग फलों से लदा होगा।”
उनके शब्दों में आमंत्रण के अलावा भी कुछ था, एक उम्मीद, जो निश्चित ही कड़ी मेहनत का फल थी।

